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धातु भेदन तत्व

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सामान्यत: पारे को षष्ठ (6) धातुओं के नाभिक को भेदन कार्य के लिए उचित माना गया है , क्यूंकि इन्हीं धातुओं के भेदन से अन्य धातुओं के प्रोटॉन्स को कम किया जाता है प्रोटॉन्स ही धातुओं के परिवर्तन के लिए उत्तरदायी माना जाता है क्यूंकि परमाणु क्रमांक प्रोटॉन्स से निर्धारित होते हैं ये आधुनिक केमिस्ट्री से लेकर कीमियागरी तक के विद्वानों को अच्छी तरह ज्ञान है क्यूंकि आधुनिक केमिस्ट्री भी यही कहती है के तत्व के नाभिक में यदि 80 प्रोटॉन्स हैं तो वह पारा है और उसमे एक भी प्रोटॉन कम हुआ तो वह Au (89 )अर्थात् स्वर्ण है ,आपको ताज्जुब होगा के किमियागर अबतक जहां तक मेरी जानकारी है चाहे वह स्वर्ण रहस्यम ग्रंथ हो या स्वर्ण तंत्रशास्त्र ,रसा पर्ण,रस रत्नाकर , अनुमानतः सभी में पारे के शोधन और उसके प्रयोग से तांबे अथवा चांदी , शीशे की धातु को स्वर्ण में बदला जाता है ,एक प्रयोग एक विद्वान हमें बता रहे थे कितनी सच्चाई होगी ये नहीं पता लेकिन कुछ जड़ीबूटियां थी और उसे पीकर मूत्र से पिघले पीतल को स्वर्ण बनाने की बात कह रहे थे ऐसा मैंने कहीं पढ़ा अथवा किसी से सुना नहीं था हां एक वृत्तांत देवरहा बाबा का सुना था ज...

स्वर्ण अनुसंधान/कीमियागिरी

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 केमिस्ट्री Vs कीमियागिरी/रस विज्ञान/धातु परिवर्तन केमिस्ट्री को सभी जानते हैं व्यावहारिक दृष्टि से इसे विज्ञान मानते हैं लेकिन क्या यह सही है कुछ विद्वानों का मत है के केमिस्ट्री एक भाषा मात्र है पदार्थो को समझने हुई खोजों और विज्ञानिको के क्रिया कलापों उनके अनुसंधान की समझ का पर्याय मात्र भर है ,जैसे एक अबोध बालक को किसी सरल सुगम भाषा की जरूरत होती है वैसे ही केमिस्ट्री है जो हुई खोजों को बताने मात्र का साधन है लेकिन केमिस्ट्री कोई नई वस्तु का निर्माण नहीं कर सकती ये कीमियागिरी रस विज्ञान और धातु परिवर्तन की आधुनिक दृष्टि नहीं  है बल्कि एक भाषा है जो व्यहारिक नियमो को दर्शाती है,जैसे शोरे का पानी,सिरके का रस जिसे एसिडिक माना जाता है ,क्षार, लवण, और समस्त केमिकल रिएक्शन को दर्शाती है अब आपको ज्ञान हो गया होगा के केमिस्ट्री बस आधुनिक रस विज्ञान की भाषा मात्र है जिसे विज्ञान उन सभी के दृष्टकोण से माना जा सकता है क्यूंकि वे लोग उस अबोध बालक की तरह हैं जिनको रस विज्ञान की समझ नहीं है तो इस आधुनिक रस विज्ञान की भाषा से पदार्थो को समझने का प्रयास करते हैं । विद्यार्थी जीवन से केमिस...

धातु भेदन

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 धातु भेदक रस  सोना ,चांदी ,तांबा , शीशा, जस्ता, टिन,लोहा ,पारा ये प्रमुख आठ धातुएं होती हैं ,जिसमें पारा द्रव रूप में पाया जाता है अन्य सभी 7 धातुएं ठोस रूप में होती हैं जिसके परिणाम स्वरूप धातुओं के भेदने में उन्हें द्रव रूप में लाना पड़ता है अब द्रव रूप में धातुएं तभी आएंगी जब उन्हें ताप/अग्नि द्वारा उनके गलनांक तक ले जाया जाए जिससे ये सभी धातुएं अपने अपने गलनाकों पर पिघल कर द्रव रूप में आ जाती हैं अब द्रव रूप इन धातुओं का तभी तक रहता है जब तक अग्नि बरकरार रहती है अर्थात जब तक ये ठंडी नहीं हो जाती ठंडी होने पे तो ठोस रूप पुन: हो जाती हैं । जब धातु गालनांक पर होती है तो ठोस धातु के अणुओं में परमाणुओं के बीच दूरियां बढ़ जाती और इसी कारण से संयोजी बंध बहुत कमजोर हो जाते हैं और ठोस धातु द्रव रूप में आ जाती है किन्तु नाभिक के अंदर प्रोटॉन्स में विशेषतया कोई बदलाव नहीं होने के कारण द्रवित धातु ठंडी होने पे पुनः ठोस रूप में आ जाती है अब आप सोचते होंगे के पिघली धातु ठंडी होने पे तो ठोस होगी ही अब विशेषतया शब्द क्यूं?? तो इसका जवाब है पारे के अलांवा भी द्रव रूप में कुछ  धातुओं ...

धातु परिवर्तन

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  धातु/तत्व परिवर्तन/ रूपांतरण विज्ञान धातु परिवर्तन से संबंधित जितने भी लेख और प्रामाणिक ग्रंथ और पुस्तकें आजतक उपलब्ध हैं उनमें से अधिकतर में संस्कृत में विदित विधियों का संग्रह है संस्कृत तो किसी भी संस्कृत भाषा का जानकार उन्हें अपनी भाषा में जान तो सकता है किन्तु गूढ़ रहस्य उसमे प्रयोग में लाई जाने वाली वस्तु या कल्प के रस और उसकी मात्रा हो जाती है अब मेन्सिल हो या हींगुल कितनी मात्रा में ली जाए ये नहीं पता होता कहीं कहीं मात्रा पता हो जाती है तो कुछ त्रुटियों को रस प्रयोग से धातु परिवर्तन के अवशिष्ट गुणों उनके शोधन को ठीक से नहीं समझ पाने से प्रयोग सही परिणाम नहीं देता ,मैंने कई लोगों को देखा कितने वर्ष बीत गए लगे हुए हैं धातु परिवर्तन में लेकिन क्या त्रुटि रह गई ये नहीं समझ पाते जब ग्रंथ लिखा गया उस समय सभी धातु  शुद्ध रूप में उपलब्ध होती थी आज के समय में ऐसा नहीं है अब बात आती है धातुओं के शोधन की रस समुच्चय में बहुत सी विधियां दी हुई हैं लेकिन उनमें भी कई गूढ़ रहस्यों से भरी हुई हैं,पहली बात भाषा संस्कृत में भी त्रुटियां अब ये जानबूझ कर की गई या कोई और बात है शायद इसपर...