धातु परिवर्तन

 धातु/तत्व परिवर्तन/ रूपांतरण विज्ञान






धातु परिवर्तन से संबंधित जितने भी लेख और प्रामाणिक ग्रंथ और पुस्तकें आजतक उपलब्ध हैं उनमें से अधिकतर में संस्कृत में विदित विधियों का संग्रह है संस्कृत तो किसी भी संस्कृत भाषा का जानकार उन्हें अपनी भाषा में जान तो सकता है किन्तु गूढ़ रहस्य उसमे प्रयोग में लाई जाने वाली वस्तु या कल्प के रस और उसकी मात्रा हो जाती है अब मेन्सिल हो या हींगुल कितनी मात्रा में ली जाए ये नहीं पता होता कहीं कहीं मात्रा पता हो जाती है तो कुछ त्रुटियों को रस प्रयोग से धातु परिवर्तन के अवशिष्ट गुणों उनके शोधन को ठीक से नहीं समझ पाने से प्रयोग सही परिणाम नहीं देता ,मैंने कई लोगों को देखा कितने वर्ष बीत गए लगे हुए हैं धातु परिवर्तन में लेकिन क्या त्रुटि रह गई ये नहीं समझ पाते जब ग्रंथ लिखा गया उस समय सभी धातु  शुद्ध रूप में उपलब्ध होती थी आज के समय में ऐसा नहीं है अब बात आती है धातुओं के शोधन की रस समुच्चय में बहुत सी विधियां दी हुई हैं लेकिन उनमें भी कई गूढ़ रहस्यों से भरी हुई हैं,पहली बात भाषा संस्कृत में भी त्रुटियां अब ये जानबूझ कर की गई या कोई और बात है शायद इसपर भी पर्दा उठाने की जरूरत है , सामग्रियों को शुधतम रूप में बनाना उनकी मात्रा और अन्य सामग्रियों के साथ मिलने पर उत्पन्न अभिक्रियाएं जो क्रमशः भिन्न भिन्न हो सकती है और उनके परिणाम और हुई त्रुटियों को फिर से जांचने के बाद सही अनुपात में मिलाना ।

धातु/तत्व पाए जाते हैं तीन अवस्थाओं में ठोस , द्रव और गैस ठोस अवस्था में पदार्थ के अणुओं में परमाणु के बीच लगा सन्योजी बंद्ध बहुत जटिल और मजबूत होता है क्यूंकि ये बहुत पास पास होते हैं नाभिकीय बल भी प्रबल होता है वहीं द्रव के अणुओं में परमाणुओं के संयोजक इलेक्ट्रॉन ठोस की तुलना में दूरी के कारण कम प्रबल होते हैं क्रमशः नाभिकीय बल तो समान होता है लेकिन परमाणुओं के बीच की दूरियां अणुओं को तुलनात्मक दृष्टि से पूरी तरह से नहीं बांध नहीं पाती परिणाम स्वरूप वह द्रव रूप में रहता है क्यूंकि परमाणु आपस में कुछ सीमा तक पास होते हैं जिससे इस प्रकार व्यवस्थित अणुओं से निर्मित पदार्थ का आकार सुनिश्चित नहीं होता वह वहीं आकार ग्रहण कर लेते हैं जहां पर होते हैं अब रही बात गैस की यह मुक्त अवस्था में होते हैं कारण इनके अणुओं में परमाणुओं के बीच नाम मात्र का बल रहता है जो संयोजकता और उनकी प्रवित्तियों को दर्शाते हैं परमाणुओं के बीच दूरी बहुत बढ़ जाती है जिससे नाभिक में भी कई तरह के परिवर्तन देखे जा सकते हैं ।

धातुएं या कोई तत्व चाहे लोहा हो चांदी ,सोना , तांबा,शीशा, पीतल,किसी भी धातु को के लीजिए जब उसे उसके उचित तापक्रम पर पिघलाते हैं तो अणुओं में व्यवस्थित परमाणुओं के बीच तापक्रम की वजह से इलेक्ट्रान के बीच संयोजी बंद्घ टूटने लगते हैं वो वहीं अवस्था में आने लगते हैं जो गुणधर्म द्रव के होते हैं ,किन्तु यहां अवस्था परिवर्तित हुई है न कि तत्व के गुण तत्व तो तभी बदलेगा या रूपांतरित होगा जब उसके नाभिक के प्रोटांस कम या ज्यादा होंगे , और केमिस्ट्री भी यही कहती है परमाणु क्रमांक से तत्व का अस्तित्व होता है  ,रस रत्नाकर ,रस समुच्चय, स्वर्ण तंत्रम , ऋग्वेद के श्री सूक्त हों या उपलब्ध किसी भी ग्रंथ को के लीजिए उसमे ज्ञात प्रयोगों में धातुओं को पिघला कर या तप्त कर किसी अन्य तत्व से मिलने पर उनके नाभिक को भेदने से ही प्रोटॉन कम या ज्यादा हो सकते हैं भेदने का गुण अबतक जितने भी धातु परिवर्तन के ग्रंथ हैं पारद की ओर ही इसारा करते हैं कितनी भी विधियां ज्ञान इकट्ठा कर लीजिए साधु संन्यासियों आश्रमों में ज्ञान प्राप्त कर लीजिए पारा ही मिलेगा जो धातु परिवर्तन कर सकने में सक्षम है वह भी तब जब वांछित ठोस धातु या तत्व द्रव अवस्था में हो इसलिए उसी अवस्था में सिद्ध या शुद्ध पारा नीभिक को भेद सकता है कितना सीधा सा उपाय है लेकिन लोगों को बाबा बबुल्ली के पीछे भागने से फुर्सत मिले तब ना हां किसी सिद्ध महात्मा के लिए ऐसे शब्द वर्जित हैं क्षमा प्रार्थी हूं सिद्ध और तपस्वी महात्मा बड़े ज्ञानी होते हैं उनके ज्ञान और त्याग को समझना इतना भी सरल नहीं लेकिन यहां बात हो रही थी धातु के भेदने की नाभिक को भेदना और अन्य तत्वों में बदलने के लिए कुछ प्रोटॉन को कम करने की प्रोटॉन कम तो काम ही हो गया क्यूंकि प्रोटॉन संख्या बदलने पर तत्व ही बदल जाता है वो उसी तत्व के गुणधर्म के अनुसार बन जाता है जैसा उसका नया परमाणु क्रमांक होता है, अब आप इस विज्ञान को इतना भी गोपनीय ना समझो सब तो बता दिया ,हां एक बात और भेदने की क्रिया पारा तो कर सकता है लेकिन द्रवित तत्व के नाभिक में पारे के साथ अन्य तत्व जो होगा वही प्रोटॉन की संख्या के साथ अपनी और उस द्रवित तत्व की संयोजकता के अनुसार तत्व परिवर्तित करने में सक्षम होता है क्यूंकि रस समुच्चय में भी यही बात कही गई और स्वर्ण तंत्राम में भी कि पारा भेद करता है द्रवित तत्व के नाभिक में अन्य तत्व प्रोटोंन को कम या ज्यादा करता है और दूसरा उपस्थित रस तत्व रंजन या कलर रंग भरने का काम करता है बनने वाले नए तत्व में इसी प्रकार के गुणधर्म होंगे ,धातु परिवर्तन का यह रस विज्ञान बड़ा ही अनोखा और विचित्र है जिसने जरा सा भी ध्यान लगाया और बुद्धि का प्रयोग किया किन्तु सही दिशा में वरना एक छोटी सी त्रुटि आपकी सारी मेहनत पर पानी फेर सकती है ,याद रखिए आप जिस धातु परिवर्तन से नया तत्व बनाने के लिए  प्रयासरत हैं वह आसान सी क्रिया है लेकिन धैर्य के साथ सही दिशा में कदम बढ़ाने पर ही सफलता मिलती है । नागार्जुन ने बहुत से प्रयोग किए कभी नए तत्व में कुछ कमियां रह गई कभी नए तत्व को ठीक से बनाने में सफलता पाई यही तो है धातु परिवर्तन का विज्ञान जो इतना भी दुर्लभ या कठिन नहीं जितना अफवाहों में होता है क्यूंकि धरती पे पैदा होने वाले मानव ने क्रमिक सफलता ही पाई आज का मानव आकाश में उड़ सकता है , साइकिल और मोटर में बड़ी यात्राएं कर सकता है , अंतरिक्ष में जाकर वापस आ सकता है किन्तु अगर पिछले कुछ अभूतपूर्व ग्रंथो के पन्ने ठीक से समझे जा सके तो हम और भी अधिक विकसित हो सकेंगे क्यूंकि पारद 108 संस्कारों के बाद कहीं कहीं किन्हीं ग्रंथो में 18 संस्कार के बाद अदभुत चमत्कार दिखाने लगता है उसकी बनी भश्म या राख ग्रहण करने मतलब खाने से कायाकल्प हो जाता है अर्थात 60 साल के इंसान का शरीर 25 साल के युवा जैसा हो जाता है अब इसमें कितनी सच्चाई है इसको तो प्रयोग ही बता सकेंगे के क्या ऐसा संभव है या नहीं क्यूंकि आजतक मेरा अनुभव रहा प्राचीन ग्रंथों में सारी बातें अबतक 100% सत्य साबित हुई हैं अब देखते हैं अगला चरण धातु परिवर्तन के बाद क्या हो सकता है l धातु परिवर्तन से संबंधित जितने भी संशय मन में हों निहसंकोच आप पूछ सकते हैं किसी भी क्रिया में अगर असफल हुए हों और नहीं कर पा रहे हों तो आप बेझिझक पूछ सकते हैं ,अकसर लोगों ने यही पूछा कि धातु तो बन गई लेकिन कलर नहीं आया जैसे अभी कुछ दिन पहले एक मित्र पूछ बैठे यार ये तो बताओ मैंने पारे को तांबे की डिबिया में बंद कर उसके किनारों पर कपड़ मिट्टी अर्थात कपड़ा और मुल्तानी मिट्टी लगा दी जब गर्म किया तो तांबा सोने जैसा मुलायम तो बन गया लेकिन सोने जैसा कलर नहीं आया , 

भाई आप कलर के लिए गंधक ,या लाल चित्रक जैसे पदार्थ तो मिलाए ही नहीं अब सोना अपने रंग में आए तो आए कैसे ।लोगों में धैर्य की कमी देखी मैंने पूछने में भी शर्म अरे मेरे मित्र बंधु ज्ञान के लिए कोई आयु नहीं होती ना ही कोई शर्म नहीं पता तो सीधी बात पूछ लो सबको गुरु बनाने की जरूरत नहीं सहायक एक मित्र भी हो सकता है या एक पुत्र समान व्यक्ति भी शर्म नहीं करना अब मै मित्र ही हूं आपका ,क्यूंकि ज्ञान कि क्लास में सभी एक ही जैसे होते हैं आपको याद होगा जब एक ही क्लास में अधिक उम्र का लड़का भी हो तो भी वह मित्र ही माना जाएगा ठीक ऐसे ही इसे भी धातु परिवर्तन या ज्ञान कि एक क्लास समझो ।हो सकता है मेरे कुछ सुझाव आपके वर्षो की असफलता को सही दिशा में ले जाएं और आपकी वर्षों की मेहनत को सफल बना दें, मेरा तो ध्रेय अर्थात संकल्प ही जनकल्याण करना है लेकिन ज्ञान के मार्ग से सत्य के मार्ग को अपना कर जहां  धैर्य और लगन व विश्वास अपनी चरम सीमा में होते हैं उन्नति और नए शिखर की ओर ,क्यूंकि गलत हाथों में ऐसे दुर्लभ ज्ञान को जाने से बचाने का दायित्व भी अब हम और आप पर है जैसे हमारी संस्कृति में सिद्ध पुरूषों ने इसे केवल श्रेष्ठ शिष्य को ही देना उचित समझा तभी तो यह विद्याएं आजतक भी हमारे बीच होकर भी इतनी गुप्त रखी गईं हैं ।मैं ये कभी भी नहीं चाहूंगा के धातु परिवर्तन और उचित परिणाम ना मिलने से वर्षो की तरह आप भी कचहरी में समोषे पकोड़े बेचने वाले उन साधक की तरह हो जाएं जिन्होंने 25 वर्षों तक प्रयोग किया किन्तु असफल होकर बैठ गए ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती कमियां दूर करने में अगर मैं आपकी सहायता कर सका तो मुझे खुशी होगी आप बेवजह उलझे हों प्रयोग कर कर के थक गए हों वर्षों कि मेहनत में जादा नहीं बहुत काम गलतियां होती है बस उन्हें अन्य तुलनात्मक और धातु परिवर्तन होने से पूर्व के परिणाम और होने के बाद के गुणधर्मिता के अनुसार बनाने के लिए उपस्थित होना चाहिए पदार्थ तो परिवर्तित दूध में नीबू डालने जैसे कुछ क्षण का कार्य है आवश्यकता है सही मार्गदर्शन की । धन्यवाद मित्रो।।

किसी मित्र ने इनका परिचय दिया के इन्होंने 25 वर्षों तक इस दोहे पर कार्य किया और अंत में कचहरी के सामने चाय समोस  की दुकान खोल ली क्यूंकि दिल में अभी भी कुछ अरमान बाकी थे इसलिए पोस्टर बनवा के दुकान का नाम ना दे कर इस दोहे को हो समर्पित कर दिया दोहे में वैसे थोड़ी त्रुटि भी है बाकी इनके दोहे को ध्यान से देखिए ये भाषा कुछ- कुछ अवधी संयुक्त भाषा में जिसे साधुक्कड़ी भाषा भी कहते हैं ब्रज शैली सी लगती है जिन शब्दों में म्हारो , जिन हि जैसे शब्द होते हैं जैसे इसमें इनहि का प्रयोग हुआ है , तोरा -मोरा कुछ समझ आप भी जरूर रहे होंगे ,और गंधक , पारा नाग तो ग्रंथो के अनुसार शीशा धातु होती है ,और नागिन तो ग्रंथों के अनुसार चांदी को कहते हैं ,अब इतना संकेत काफी है लेकिन इसमें एक छोटा सा प्रयोग भी गुप्त रूप से विद्यमान है सफल लोग समझ गए होंगे ,किन्तु यह कार्य भिन्न भिन्न रूपों में करना है गलती तो हुई होगी  जो इन महाशय की तरह बहुत से लोग करते होंगे एक साथ मिलाकर खिचड़ी बनाने वाला कार्य ,चलो एक और संकेत दे देते हैं धातु परिवर्तन में अधिकांशत: भस्म का प्रयोग होता होता है और दोहे में भी जरा सी त्रुटि है वरना स्वर्ण बनने में 25 वर्ष नहीं बस 25 मिनट लगते । 


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