धातु भेदन

 धातु भेदक रस 


सोना ,चांदी ,तांबा , शीशा, जस्ता, टिन,लोहा ,पारा ये प्रमुख आठ धातुएं होती हैं ,जिसमें पारा द्रव रूप में पाया जाता है अन्य सभी 7 धातुएं ठोस रूप में होती हैं जिसके परिणाम स्वरूप धातुओं के भेदने में उन्हें द्रव रूप में लाना पड़ता है अब द्रव रूप में धातुएं तभी आएंगी जब उन्हें ताप/अग्नि द्वारा उनके गलनांक तक ले जाया जाए जिससे ये सभी धातुएं अपने अपने गलनाकों पर पिघल कर द्रव रूप में आ जाती हैं अब द्रव रूप इन धातुओं का तभी तक रहता है जब तक अग्नि बरकरार रहती है अर्थात जब तक ये ठंडी नहीं हो जाती ठंडी होने पे तो ठोस रूप पुन: हो जाती हैं । जब धातु गालनांक पर होती है तो ठोस धातु के अणुओं में परमाणुओं के बीच दूरियां बढ़ जाती और इसी कारण से संयोजी बंध बहुत कमजोर हो जाते हैं और ठोस धातु द्रव रूप में आ जाती है किन्तु नाभिक के अंदर प्रोटॉन्स में विशेषतया कोई बदलाव नहीं होने के कारण द्रवित धातु ठंडी होने पे पुनः ठोस रूप में आ जाती है अब आप सोचते होंगे के पिघली धातु ठंडी होने पे तो ठोस होगी ही अब विशेषतया शब्द क्यूं?? तो इसका जवाब है पारे के अलांवा भी द्रव रूप में कुछ  धातुओं के पाए जाने के बारे में आपको आधुनिक केमिस्ट्री नहीं बताती के वो भी होती हैं जैसे द्रवित लोहा जो पिघला ही रहता है बिना ताप के भी कमरे के सामान्य तापमान पर भी । धातु तो पिघली अब इसी पिघली धातु में जब पारा मिला होता है तो वह उस धातु के परमाणुओं के बीच बंध के साथ- साथ उस धातु के परमाणु के नाभिक के संयोजी इलेक्ट्रॉन के साथ जुड़ने के और नाभिक के भीतर प्रोटॉन्स को कम करने का कार्य करते हैं जिससे उस धातु के परमाणु क्रमांक में कमी हो जाती है अब ये बात हमेशा याद रखिए के पारे या उसकी जैसी गुण धर्मिता रखने वाले हर पदार्थ जब अन्य पदार्थ के साथ जुड़ता है तभी सान्योजी इलेक्ट्रॉन की वजह से दोनों तत्वों के संयोजन की और उसके परमाणु के नाभिक में प्रोटॉनों के कमी के जैसे ऐसे तत्व के गुण उसमे आ जाते हैं जो उससे एक या 2 परमाणु क्रमांक कम होता है ।अबतक जितने भी कीमियागिरी या धातु परिवर्तन विज्ञान के जानकार हुए हैं सब एक लीक अर्थात् अन्य से देखें या शीखे हुए लगते हैं प्रामाणिक कीमियागर बस् कुछ ही हैं जिन्होंने खोजों प्रयोगों और ढेर सारे अन्वेशण कर यह ज्ञान पाया की धातु को कैसे अन्य धातु में बदलें क्यूंकि पारा अधिक परमाणु क्रमांक को कम करता है, कुछ तो ऐसे भी विद्वान मिले खाश कर मुगलों के शासन काल में अधिकतर पारे को ही स्वर्ण में बदल दिए हां ये आसान भी है पारे में लौह तत्व निकाल कर उसमे अभ्रक मिलाकर या कोई अग्नि स्थाई करने वाला पदार्थ जैसे समुद्रफल, ग्वार पाठा ( एलोवेरा) मिलाकर उसे उच्च ताप पर स्थिर कर लेते हैं जिससे उसके परमाणुओं के संयोजक बंधों के बीच में तापक्रम निकालने के लिए रिक्त स्थान मिल जाए जिससे वह पदार्थ गैस या भाप अवस्था में ना जाए और फिर  गंधक  मिलान  पर गंधक पारे के नाभिक से एक प्रोटॉन कम कर देता है और अपना रंग भी पारे को दे देता है (रंग देने वाले लक्षण पर थोड़ा और कार्य करने की जरूरत है ,आप इसे अनुमानतः समझ सकते हैं) प्रोटॉन कम होने का मतलब (Hg पारा -80  एक कम अर्थात 79 जो के Au Gold स्वर्ण का परमाणु क्रमांक है अर्थात )  नया तत्व ,इस प्रकार धातु परिवर्तन को समझा जा सकता है ।

Comments

  1. कई वर्ष पूर्व 1995 में मैंने एक ठग से दीक्षा ली थी, उसका नाम श्रीमाली था। एक नंबर का कुत्‍ता था साला, मेरे लाखों रूपये डूब गए और वह एक फ्राड था।

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  2. मैं श्री माली को नही जानता न ही मैं आपको जनता हूँ लेकिन जो विज्ञान और सत्य है प्रयोग और लाखों परीक्षण पश्चात जो निष्कर्ष निकलता है जो परिणाम प्राप्त होता है उसे जानता हूँ।। मान्यवर दीक्षा लेने से कोई ऐसी दुर्लभ विद्या को नही प्राप्त कर लेता या जान लेता है ।। यह एक गुप्त और दुर्लभ विज्ञान है लाखों बार परीक्षण और निष्कर्षों का परिणाम है जिसे हर किसी को नही बताया जा सकता है ।।

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